क्या है नागरिकता संशोधन बिल 2019?

# जिस तरह अभी पूरे देश में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ लोग गुमराह होकर विरोध कर रहे हैं, वैसे ही नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन लागू होने के दौरान भी हो रहा था. विरोध में अधिकतर लोग दूसरों की बातों पर भरोसा कर के हाथों में झंडे और कई बार पत्थर तक उठा ले रहे थे. आइए एक बार फिर से समझें कि नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन यानी एनआरसी क्या है, जिसे सीएबी से जोड़ते हुए विरोध के स्वर बुलंद किए जा रहे हैं.
#  एनआरसी से यह पता चलता है कि कौन भारत का नागरिक है और कौन नहीं. जो इसमें शामिल नहीं हैं और देश में रह रहे हैं उन्हें अवैध नागरिक माना जाता है.
# असम एनआरसी के तहत उन लोगों को भारत का नागरिक माना जाता है जो 25 मार्च 1971 से पहले से असम में रह रहे हैं. जो लोग उसके बाद से असम में रह रहे हैं या फिर जिनके पास 25 मार्च 1971 से पहले से असम में रहने के सबूत नहीं हैं, उन्हें एनआरसी लिस्ट से बाहर कर दिया गया है.
# एनआरसी लागू करने का मुख्य उद्देश्य ही यही है कि अवैध नागरिकों की पहचान कर के या तो उन्हें वापस भेजा जाए, या फिर जिन्हें मुमकिन हो उन्हें भारत की नागरिकता देकर वैध बनाया जाए.
#एनआरसी की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि 1971 के दौरान बांग्लादेश से बहुत सारे लोग भारतीय सीमा में घुस गए थे. ये लोग अधिकतर असम और पश्चिम बंगाल में घुसे थे. ऐसे में ये जरूरी हो जाता है कि जो घुसपैठिए हैं, उनकी पहचान कर के उन्हें बाहर निकाला जाए.

नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन क्या है?

नागरिकता संशोधन बिल के सामने आने के बाद से तरह-तरह की बहस हो रही हैं. कुछ लोग कह रहे हैं कि ये एनआरसी का उल्टा है तो ममता बनर्जी जैसे लोग कह रहे हैं इसे लाया ही इसलिए गया है ताकि एनआरसी को लागू करना आसान हो जाए, दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. अब सवाल ये है कि आखिर इन दोनों में अंतर क्या है और किस बात को लेकर पूरा बवाल मचा हुआ है.
# नागरिकता संशोधन कानून में एक विदेशी नागरिक को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान है, जबकि एनआरसी का मकसद उन लोगों की पहचान करना है जो भारत के नागरिक नहीं हैं, लेकिन भारत में ही रह रहे हैं.
# सीएबी के तहत 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत आए हिंदू, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी लोगों को नागरिकता देने के नियमों में ढील दी गई है. जबकि एनआरसी के तहत 25 मार्च 1971 से पहले से भारत में रह रहे लोगों को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान है.

नागरिकता संशोधन बिल vs नेशनल रजिस्टर सिटिजन (CAB vs NRC)

नागरिकता संशोधन बिल के सामने आने के बाद से तरह-तरह की बहस हो रही हैं. कुछ लोग कह रहे हैं कि ये एनआरसी का उल्टा है तो ममता बनर्जी जैसे लोग कह रहे हैं इसे लाया ही इसलिए गया है ताकि एनआरसी को लागू करना आसान हो जाए, दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. अब सवाल ये है कि आखिर इन दोनों में अंतर क्या है और किस बात को लेकर पूरा बवाल मचा हुआ है.
# नागरिकता संशोधन कानून में एक विदेशी नागरिक को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान है, जबकि एनआरसी का मकसद उन लोगों की पहचान करना है जो भारत के नागरिक नहीं हैं, लेकिन भारत में ही रह रहे हैं.
#  सीएबी के तहत 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत आए हिंदू, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी लोगों को नागरिकता देने के नियमों में ढील दी गई है. जबकि एनआरसी के तहत 25 मार्च 1971 से पहले से भारत में रह रहे लोगों को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान है.

CAB के नाम पर NRC का विरोध!

भले ही लोग नागरिकता संशोधन कानूनका विरोध करने के लिए सड़कोंपरउतरेहैं, लेकिनअसलमें वह विरोध कर रहे हैं एन आर सी का बल्कि यूं कहिए किये दोनों ही एक दूसरेसे जुड़े हुएहैं. प्रदर्शनकररहेलोगकहरहेहैंकि नागरिकता संशोधन कानूनमें मुस्लिमों को शामिल क्यों नहीं किया गया है? उनका आरोप है कि ये सरकारमुस्लिमों की नागरिकता छीनना चाहतीहै. कहा जा रहा है कि मोदी सरकार एनआरसी से बाहरहुए हिंदुओं औरअन्य धर्मोंके लोगोंको नागरिकता संशोधन कानून के तहत नागरिकता दे देगी.